घरौंदों में रहिये महफूज़ रहिये



वर्तमान परिदृश्य में नाद-
---------------
योग की प्रासंगिकता-
--------------
आज हम21वीं श.की डगर पर हैं और विज्ञान जीवन का एक तरीका  बन गया है। हम में से अधिकांश लोग विज्ञान को मात्र एक ऐसा जगत मानते हैं जिसमें यंत्र ही यंत्र है। यांत्रिक दृष्टिकोण है और अस्तित्व की हर रोज की संभावनाएं हैं। मुश्किल से ही कोई यह जानने की परेशानी  उठाता है की जीवन का प्रयोजन या जीवन का विज्ञान क्या है ?जबकि यह मनुष्य के सारे क्रियाकलापों का आरंभ और आधार होना चाहिए वैज्ञानिक अनुसंधानों का यह क्षेत्र परम सत्य की खोज विश्व की एकता और दिव्यता कि सर्वव्यापकता की खोज से जुड़ा है और यही वह क्षेत्र है. जिसमें भारत कितनी ही शताब्दियों से विशिष्ट और अग्रणी रहा है ।आधुनिक भौतिक विज्ञान के रूपाकार  ग्रहण करने से पूर्व ही जीवन के इस विज्ञान ने यहाँ पूर्णता प्राप्त कर ली थी और इसे विवेकशील मनुष्य की आत्म प्रकाशन के लिए एक उपयोगी यंत्र के रूप में प्रदान किया गया था और यही योग विज्ञान या योग विद्या जो मनुष्य को उसकी आत्म- जागृति के अंतर्निहित शक्तियों एवं संभावनाओं से परिपूर्ण इस पूरे ब्रह्मांड के प्रति जागरूक होने में शाश्वत नित्य एवं अनंत के ज्ञान द्वारा स्वयं अपने को प्रतिरूपता देने एवं अंतर बाह्य सामंजस्य और शांति पाने में मद्द करती है सामने जो कुछ भी दृश्य प्रपंच है उसमें कारण कार्य संबंध का स्थापित करना विज्ञान का लक्ष्य है विज्ञान के पास विश्लेषण का उपकरण है अनुमान ,अवलोकन और प्रयोग का प्रणाली क्रम है यही विज्ञान की महत्ता है।
 इस वैज्ञानिक प्रणाली क्रम में मानव मन के अधिक विशाल एवं अधिक नम्य स्वभाव का रूप सन्नहित है। इसी संदर्भ में समसामयिक घटना के अंतर्गत मेरा भी अनुमान है कि आने वाले समय में हमारी प्राचीन पद्धतियाँ जैसे कि- नाद उच्चारण और ध्वनि, शंखनाद, गुंजन इत्यादि से एकाएक वैश्विक महामारी कोरोना कोविड-१९के फैलाव में भी तरंगों से विक्षोभ पैदा करके उसकी तीव्रता को बाधित किया जा सकता है। जैसा कि हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी के आह्वान पर समस्त भारतवासियों ने 22 मार्च 2020 को ध्वनि शंखनाद प्रचारित किया था ।इसी प्रकार के उच्चारण हमारे प्राच्य साहित्य से प्राप्त होते रहे हैं जैसे कि युद्ध काल से पूर्व शंखनाद करके सैनिकों को संगठित ऊर्जावान एवं उत्साहित करके कर्मशील बनाया जाता रहा है. तथा आम जीवन में भी किसी उच्च उत्कृष्ट धार्मिक अनुष्ठान के समय शंखनाद करके ऊर्जा संगठित  ऊर्जावान एवं उत्साहित करके कर्मशील बनाया जाता रहा है तथा आम जीवन में भी किसी उच्च उत्कृष्ट धार्मिक अनुष्ठान के समय शंखनाद करके उर्जा संगठित की जाती रही है। सामूहिक संगठन से ऊर्जा एकत्रित होकर मनुष्य स्फूर्ति वान महसूस करता है। ऐसा लगता है कि अपने आने वाले समय में भारतवर्ष संसार को शोद्ध के नए विषय देगा - जो कि मानवता के लिए बहुमूल्य साबित होंगे ऐसी मेरी आशा ही नहीं विश्वास है ।    

ममता सिंह
३१.३.२०