तिमिर

उठो!
प्रकाश को
ढूँँढ लाऐं
कल के 
उजालों के लिऐं
चलों-
मिल के
लड़ लें
आज
कल की खुशहाली
के लिऐ
बढो-
तंगहाली भगानेंं
के लिऐ
हुँकार भरो
मानवता के लिऐ
अरे तिमिर
तू मुझे
न मिटा पाएगा
प्रज्वलित प्रज्ञा
हर किरण
संसार के लिऐ।

ममता सिंह
४.४.२०